Babaji Sri Radha Vallabh Goswamiji

बाबा श्री राधावल्लभ गोस्वामी जी

वृन्दावन के एक बाबा श्री राधावल्लभ गोस्वामी जी के माता पिता उन्हें बाल्यकाल में ही छोड़ के चले गए!

जब बडे हुए तो वृन्दावन जाकर श्री गोपीनाथ जी के मंदिर में आश्रय लिया! वे मंदिर के भण्डार का खाता लिखते

उन्हें वहां दोनों समय का प्रसाद और एक रुपया महीना मिल जाता, सादा जीवन व्यतीत करते,और सदा भगवान् का

नाम स्मरण करते रहते! उनका कहना था कि "जो व्यक्ति धाम की शरण लेता है,उस के सारे अपराध क्षय(नष्ट)

हो जाते है,और जो यहाँ आ कर भी अपराध करते है,उन्हें उसके फल अवश्य भोगने पड़ते है!इस विषय में वे दो

घटनाओ का वर्णन करते…

१.एक वैष्णव बाबा जी रात्री में पंचकोसी परिक्रमा किया करते ,एक दिन उन्होने देखा कि रास्ते में कुछ वैष्णव

भोजन कर रहे थे!उन्होने बाबा को भी प्रसाद के लिए आग्रह किया,तो बाबा ने कहा,अभी खाऊंगा तो नहीं,थोडा

बाँध कर दे दो!जब घर आकर बाबा ने पोटली खोली तो उसमें खोपरियों(कंकाल की खोपरी) के सिवा कुछ न था

बाबा समझ गए के वो लोग कौन थे!क्यूंकि जो लोग धाम में रहकर अपराध करते है,उनका धाम त्याग तो नहीं

होता,पर सद्गति भी नहीं होती!

२.वृन्दावन में झाडू मंडल में दो बाबा रहते थे,दोनों में बहुत प्रेम था,एक का देहांत हो गया!एक दिन दुसरे बाबा

रात्री को परिक्रमा के लिए जा रही थे,तो उन्हे कुछ वैष्णवों के साथ अपने मित्र बाबा भी दिखे,बाबा पहले तो उन्हें

देख भयभीत हुए,पर उन के मित्र बाबा ने कहा…डरो मत,मेरा देह त्याग हो चुका है,पर मेरी सद्गति नहीं हुए,क्योंकि

मैं जहाँ भजन करता था,वहां ईंट के नीचे २ रुपय रखे थे,जिस मैंने वैष्णव सेवा में लगाने का सोचा था,पर कर नहीं

पाया! तो मेरी वासना वहीँ अटकी रह गयी!सो तुम कृपया मेरा ये कार्य पूरण कर दो,बाबा ने वैसा ही किया! और उन

बाबा की आत्मा को सद्गति प्राप्त हुई!

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