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तुम तसल्ली न दो ,सिर्फ बैठे रहो ,वक़्त कुछ मेरे मरने का , टल जायेगा
क्या ये कम है , मसीहा के होने ही से ,मौत का भी इरादा ,बदल जायेगा

मेरा दामन तो जल ही चूका है , मगर आंच तुम पर भी आये , गवारा नहीं ,
मेरे आंसू न पोंछो , खुदा के लिए ,वरना दमन तुम्हारा भी ,जल जायेगा

फूल कुछ इस तरह तोड़ , एय बागबान ,शाख हिलने न पाए , न आवाज़ हो ,
वरना गुलशन मे फिर , न बहार आयेगी , हर कलि का कलेजा दहल जायेगा

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