1 September, 2013 19:32

Hanuman Prasadji Poddar – Bhaiji

भगवान किसी को दण्ड नहीं देते, मनुष्य आप ही अपने को दण्ड देता है| भगवान प्रेमस्वरूप है-सर्वथा प्रेम है और वे जो कुछ है, वे ही सबको सर्वदा वितरण कर रहे है !

भगवतचर्चा पुस्तक से, ‘भगवान प्रेम स्वरूप हैं’ से संकलित

Jaydayalji Goyandka – Sethji
परमात्मा श्रीकृष्ण अपने प्रेमी भक्तों को आश्वासन देते हुए घोषणा करते है ‘जो अनन्यभाव से मुझमे स्तिथ हुए भक्तजन मुझ परमेश्वर को निरन्तर चिन्तन करते हुए निष्काम भाव से भजते है, उन नित्य एकीभाव में मुझमे स्तिथी वाले पुरुषों को योगक्षेम मैं स्वयं प्राप्त करा देता हूँ | भगवान की इस घोषणा पर विश्वासकर कठिन-से-कठिन मार्गपर अग्रसर होने में संकोच नहीं करना चाहिये |

तत्वचिन्तामणि पुस्तक से, ‘ईश्वर सहायक हैं’ नमक लेख से संकलित

Swami Ramsukhdasji
सब कुछ भगवान्‌ ही हैं‒यह भाव विवेकसे भी तेज है । …… ज्ञानयोग विवेक-मार्ग है । जबतक विवेक है, तबतक तत्त्वज्ञान नहीं है, प्रत्युत तत्त्वज्ञानका साधन है । अत्यन्त वैराग्य न होनेसे विवेकमार्गमें असत्‌की सत्ताका भाव रहता है । असत्‌की सत्ताका भाव रहनेसे विवेकप्रधान साधकमें निरन्तर आनन्द नहीं रहता । कारण कि संसार दुःखालय है, इसलिये संसारकी सत्ताका किंचिन्मात्र भी संस्कार रहेगा तो विवेक होते हुए भी दुःख आ जायगा । इस असत्‌की सत्ताके संस्कार भीतर रहनेके कारण ही साधककी यह शिकायत रहती है कि बात तो ठीक समझमें आती है, पर वैसी स्थिति नहीं होती ! …. यदि भावमें एक भगवान्‌ ही रहें‒‘वासुदेवः सर्वम्’ तो ऐसी दुविधा रह ही नहीं सकती । ‒ ‘भगवान्‌ और उनकी भक्ति’ पुस्तकसे

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