4 types of devotees

|| चार प्रकार के भक्त ||

भगवान ने गीता [ श्लोक ७ / १६ ] में चार
प्रकार के भक्तों का वर्णन किया है |

प्रथम ,
जो स्त्री , पुत्र , धन ,भवन आदि भोग
पदार्थों के लिए भगवान का भजन करते हैं – जैसे
ध्रुव आदि | ये अर्थार्थी भक्त हैं |

द्वितीय ,
जो लौकिक दु:खों की निवृति के लिए भगवान
का भजन करते हैं – जैसे द्रोपदी , गजेन्द्र
आदि | ये आर्त भक्त हैं |

तृतीय , वे जिज्ञासु
भक्त हैं , जो बड़ी – से – बड़ी विपत्ति में
भी भगवान से कुछ नहीं चाहते , केवल भगवत-
तत्त्व जानने के लिए निरंतर भजन , ध्यान ,
सत्संग करते रहते हैं – जैसे ऊधव आदि |

तथा चौथे , वे निष्काम भक्त हैं ,
जो मुक्ति की भी इच्छा नहीं करते – जैसे
प्रहलाद आदि |

प्रहलाद में निष्कामभाव चरम
सीमा को पहुँचा हुआ था | भगवान
श्री नरसिंहदेव ने प्रकट होकर जब प्रहलाद
से बार – बार बड़े ही वात्सल्य भाव से वर
मांगने के लिए कहा , तब प्रह्लादजी बोले – "
भगवन ! मेरे मन में कुछ भी इच्छा प्रतीत
नहीं होती , पर जब आप बार – बार कह रहे हैं
तब पता चलता है की मेरे मन में कोई
छिपी इच्छा होगी | अतैव हे दयामय ! आप मुझ
पर प्रसन्न हैं तो यही वर दीजिए
की यदि कोई
छिपी वासना हो तो उसका सर्वथा नाश
हो जाय |" यही निष्काम भक्ति है | उपरोक्त
सभी भक्तों में ज्ञानी भक्त भगवान
को अति प्रिय है |

भगवान गीता [ श्लोक ७ /
१७ ] में कहते हैं , " उनमें नित्य मुझमें एकीभाव
से स्थित अनन्य प्रेमभक्ति वाला ज्ञानी भक्त
अति उत्तम है , क्योंकि मुझको तत्त्व से जानने
वाले ज्ञानी को मैं अत्यंत प्रिय हूँ और वह
ज्ञानी मुझे अत्यंत प्रिय है |"

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