Bhavgrahi Bhagavan – भाव के भूखे हमारे भगवन्‌ !

भाव के भूखे हमारे भगवन्‌ !

जो भक्त अनायास यथासाध्य प्राप्त पत्र (तुलसीदल आदि),पुष्प,फल,जल आदि भी प्रेमपूर्वक भगवान्‌ के अर्पण करता है,तो भगवान्‌ उसको खा लेते हैं।
जब भक्तका भगवान्‌ को देने का भाव बहुत अधिक बढ़ जाता है,तब वह अपने-आपको भूल जाता है।भगवान्‌ भी भक्तके प्रेम में इतने मस्त हो जाते हैं कि अपने-आपको भूल जाते हैं।प्रेमकी अधिकता में भक्तको इसका ख्याल नहीं रहता कि मैं क्या दे रहा हूँ,तो भगवान्‌ को भी यह ख्याल नहीं रहता कि मैं क्या खा रहा हूँ! जैसे विदुरानी प्रेमके आवेशमें भगवान्‌ को केलोंकी गिरी न देकर छिलके देती हैं,तो भगवान्‌ उन छिलकोंको भी गिरी की तरह खा लेते हैं!
वास्तवमें पदार्थोंकी मुख्यता नहीं है,प्रत्युत भक्तके भाव की मुख्यता है;क्योंकि भगवान्‌ भावके भूखे हैं;पदार्थों के नहीं।अत: अर्पण करनेवालेका भाव मुख्य(भक्तिपूर्ण) होना चाहिये।जैसे पतिकी सेवामें समय,वस्तु,क्रिया लगनेपर पतिव्रता स्त्रीको बड़ा आनन्द आता है;क्योंकि पतिकी सेवामें ही उसको अपने जीवनकी और वस्तु की सफलता दीखती है।ऐसे ही भक्तका भगवान्‌ के प्रति प्रेम-भाव होता है,तो वस्तु चाहे छोटी हो या बड़ी हो.साधारण हो या कीमती हो,उसको भगवान्‌ को अर्पण करनेमें भक्त को बड़ा आनन्द आता है।उसका भाव यह रहता है कि वस्तुमात्र भगवान्‌ की ही है।मेरेको भगवान्‌ ने सेवा-पूजा का अवसर दे दिया है-यह मेरेपर भगवान्‌ की विशेष कृपा हो गयी है! इस कृपा को देख-देखकर वह प्रसन्न रहता है।

भावपूर्वक लगाये हुए भोगको भगवान्‌ अवश्य स्वीकार करते हैं,चाहे हमें दीखे या न दीखे।इस विषयमें एक आचार्य कहते थे कि हमारे मन्दिरमें दीवाली से होली तक अर्थात्‌ सरदीके दिनोंमें ठाकुरजीको पिस्ता,बादाम,अखरोट,काजू,चिरौजी आदि का भोग लगाया जाता था;परन्तु जब यह बहुत महँगा हो गया,तब हमने मूँगफलीका भोग लगाना शुरु कर दिया।एक दिन रातमें ठाकुरजी ने स्वपनमें कहा-’अरे यार! तू मूँगफली ही खिलायेगा क्या?’ उस दिनके बाद फिरसे मेवा का भोग लगाना शुरु कर दिया।उनको यह विश्वास हो गया कि जब ठाकुरजीको भोग लगाते हैं,तब वे उसे अवश्य स्वीकार करते हैं।

भोग लगनेपर जिन वस्तुओंको भगवान्‌ स्वीकार कर लेते हैं,उन वस्तुओं में विलक्षणता आ जाती है अर्थात्‌ उन वस्तुओंमें स्वाद बढ़ जाता है,उनमें सुगन्ध आने लगती है;उनको खाने पर विलक्षण तृप्ति होती है,वे चीजें कितने ही दिनोंतक पड़ी रहनेपर भी खराब नहीं होतीं,आदि-आदि।परन्तु यह कसौटी नहीं है कि ऐसा होता ही है।कभी भक्त का ऐसा भाव बन जाय तो भोग लगी वस्तुओं में ऐसी विलक्षणता आ जाती है-ऐसा हमने सन्तों से सुना है।
मनुष्य जब पदार्थोंकी आहुति देते हैं तो वह यज्ञ हो जाता है;चीजोंको दूसरोंको दे देते हैं तो वह दान कहलाता है,संयमपूर्वक अपने काममें न लेने से वह तप हो जाता है और भगवान्‌ के अर्पण करनेसे भगवान्‌ के साथ योग (समबन्ध) हो जाता है-ये सभी एक ’त्याग’ के ही अलग-अलग नाम हैं।
-साधक-संजीवनी ९/२६ से

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