Sri Kaikeyiji – Bhaiji Sri Hanuman Prasadji Poddarji

यह कैकेयी जो रही, यह भगवान्‌राघवेन्द्रकी सबसे प्रिय कार्य करनेवाली थी। कैकेयीके समान प्यार करनेवाली भगवान्‌के लिये जगत्‌में कोई हुई ही नहीं। भगवती सीता साथ गयीं। उनका नाम अमर हो गया, वे कितनी पतिव्रता हैं। भरतजीने भगवान्‌के प्रेमका त्यागके द्वारा उदाहरण दिया और भरतजी धन्य हो गये। लक्ष्मणजीने भगवान्‌रामके लिये अपना घर-द्वार त्याग दिया, उनकी बड़ी प्रशंसा है। परंतु कैकेयीको बड़े शीलवान्‌, बड़े मृदुभाषी भरतजीने अपशब्द कहे। कैकेयीको ऋषि-मुनियोंने बुरा कहा। कैकेयीको जगत्‌का आजतक इतिहास बुराई देता है। बड़े-बड़े बुरे सम्बोधनोंसे कैकेयीको पुकारा जाता है। पर कैकेयीने किया क्या? कैकेयीने किया राम-काज।… यह प्रेमका सबसे ऊँचा नमूना है कि जहाँ प्रेमकी कहीं कोई तारीफ नहीं होती, जहाँ उसकी निन्दा ही निन्दा होती है। सारा जगत्‌केवल अभी ही नहीं, हमेशाके लिये जिससे घृणा करता है, कुटिला, कलंकिनी आदि नाम देकर निन्दित करता है, पर जिसके जीवनमें राम-काज करनेके सिवाय और कुछ है ही नहीं, उसीका नाम है कैकेयी। (‘श्रीभरत चरित्र’ गीतावाटिका प्रकाशन-पृष्ट-५)

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