2 June, 2014 07:00

मुझे आपने बुलाया…

दया क्या ये कम है ओ घनश्याम प्यारे, जो चरणों में तेरे ठिकाना मिला है
बड़े भाग्यशाली है वो तेरे बन्दे, जिन्हे आपसे दिल लगाना मिला है

मुरारी मै रहमत के सदके तुम्हारी, जो चरणों में ये सर झुकाना मिला है
वो क्या बाग़-ऐ-जन्नत की परवाह करेंगे, जिन्हे आप सा आशियाना मिला है

इशारों से किस्मत बदल देने वाले, मुरादों से दामन को भर देने वाले
तु है मेरा स्वामी मै तेरा पुजारी, तु है मेरा दाता मै तेरा भिखारी

मुझे आपने बुलाया ये करम नहीं तो क्या है, मेरा मर्तबा बढाया ये करम नहीं तो क्या है

हाँ प्यारे ! कहाँ तेरी चौखट और कहाँ मेरी जमीं (ललाट) !!!

प्यारे तुम्हारे रसिकों की, प्रेमियों की संगत, तेरे दरबार की चौखट मेरे पुरुषार्थ का परिणाम नहीं हो सकती ! किसी साधना, उपासना या सत्कर्मों का परिणाम नहीं हो सकती ! यह तो तेरी महती अनुकम्पा है, वरना हम तो मायानगरी के, मोह की नगरी के, बैठे होते कही किसी होटल में, क्लब में, टीवी-विडिओ ना जाने और कहाँ कहाँ होते – लेकिन तेरा ही बुलावा आया है !!!

कहाँ तेरी चौखट कहाँ मेरी जमीं, तेरे फ़ैज़ों करम की तो हद ही नहीं !!!

मै ग़मों की धूप में जब तेरा नाम ले के निकला, तेरी रहमतों का साया ये करम नहीं तो क्या है

ग़मों की धूप प्यारे – ये जीवन की राहें थी तो बड़ी कठिन, ये struggle tension negative thinking क्योंकि असफलताओं
के दौर जो चले. मै negative में ही जा रहा था लेकिन वाह रे तेरी करुणा नजर !!! मै फिसला तो जरूर लेकिन तुमने पूर्णरूपेण गिरने नहीं दिया ! हर बार negative में ही गया लेकिन कहीं ना कहीं से तेरी करुणा ऐसी हो जाती है कि positive rays मिलती और मै फिर से सम्हल जाता

मै ग़मों की धूप में जब तेरा नाम ले के निकला, तेरी रहमतों का साया ये करम नहीं तो क्या है

आप जब से हमसफ़र हो गये, रस्ते बड़े मुक्तसर हो गये (मुक्तसर यानि आसान)
जीवन की राहें थी तो बड़ी कठिन लेकिन वही बात
आप जब से हमसफ़र हो गये, रस्ते बड़े मुक्तसर हो गये और एक तेरा दर क्या छूटा, हम दरबदर हो गये

मै ग़मों की धूप में जब तेरा नाम ले के निकला, तेरी रहमतों का साया ये करम नहीं तो क्या है

मेरी लब्जीशों को पैहम मिले आपके सहारे, मै गिरा तो खुद उठाया ये करम नहीं तो क्या है

लब्जीशों बोलते है ग़लतियों को और पैहम यानि लगातार Continuous प्यारे मै ग़लतियों पे ग़लतियों करता गया लेकिन वाह रे तेरी करुणा नज़र!!! किसी भी जीव के दोष देखती ही नहीं !!!

मुझे वक्त-ऐ-जिक्र करके मेरी रूह में उतर के, मेरे दिल को दिल बनाया ये करम नहीं तो क्या है

वक्त-ऐ-जिक्र करके – प्यारे तुमने ऐसे अनुभव करवा दिये, एक दृष्टा भाव साक्षी भाव दे दिया – कौन सा ?
कि करते हो तुम कन्हैया, मेरा नाम हो रहा है और जब से इस भाव की पुष्टि होने लगी तो क्या हुआ ?

ये साधनाओं की आवश्यकताएँ नहीं रही – किस प्रकार ?
मेरी रूह में उतर के – मेरे अपने ही अंदर तुम आत्मा के रूप से, साक्षी भाव से सब देख रहे हो
तुम व्याप्त तो थे लेकिन अंदर से व्यक्त होने लगे. परिणाम क्या हुआ ?
जो तुम्हे बाहर पाने की दौड़ थी, तुमने सब समाप्त कर दी – तो क्या हुआ ?

आशिक़ कहता है, सूफी कह देता है कि –

मेरे दिल में अमी के कुण्ड भरे, जब चाहूँ मै पिऊ भर-भर के
बिन पिए नशे में चूर रहूँ, मयखानों की परवाह कौन करे

मेरे अपने ही दिल में खुदाई है, काबा है ऊर अंतर में
जब दिल में खयाले सनम नबी, फिर औरों की पूजा कौन करे

ये रस्मी पूजा कौन करे – तुमने सुमिरन में प्रवेश करा दिया प्यारे, तो क्या हुआ ?
कि ना मै जाऊं द्धारका, ना जाऊं मै काशी
जहाँ बिछा दूँ अपना आसन, वहीं मेरा अविनाशी

ये कैसे हुआ ? मुझे वक्त-ऐ-जिक्र करके

मेरे दिल को दिल बनाया – अब ये मांस का लोथड़ा नहीं रहा जिसका काम केवल blood circulation या purification या धड़कना हो ! प्यारे इसके अंदर अब तुम्हारे लिए भावनाएं मचलने लगी और इन भावनाओं ने क्या किया ? तुम्हारा अहसास भी करवाया, तुम्हारा अनुभव भी करवाया…

उनकी कृपा का अनुभव हमें क्यों नहीं होता ?

क्योंकि हम अपने ही अनुभव का अनादर करते है ! कोई जीव ऐसा है ही नहीं जिसको कभी ना कभी उसने अपना अनुभव न कराया हो. हमारी मजबूरियाँ क्या है, कमजोरियाँ ही कहिये – हम दूसरों के सुनने पर अधिक जाते है और जो उसने करुणा हमारे ऊपर की है, उन क्षणों को हम भूल जाते है !

उन्ही क्षणों को यदि बार-बार याद किया जाये तो प्रभु के ऊपर विश्वास दृढ़ होता जाता है और विश्वास जितना दृढ़ होता है हमारा बाहर भटकना उतना कम होता जाता है – क्यों ? जीव कब भटकता है ? जब उसका विश्वास भटकता है, जब उसका विश्वास कमजोर होता है तो कभी इस देवता में, कभी उस धरम में, कभी यहाँ कभी वहां – क्योंकि विश्वास एक जगह कायम नहीं हो पाता है

और जब उसका अनुभव हम अपने self-realization में देखते है तो पता चलता है कुछ करने की जरुरत ही नहीं – सब कुछ अपने आप हो रहा है और यही अनुभव क्या कहता है – मेरे दिल को दिल बनाया, ये करम नहीं तो क्या है

मुझे आपने बुलाया ये करम नहीं तो क्या है, मेरा मर्तबा बढाया ये करम नहीं तो क्या है…

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