आजु रस, बरसत कुंजन माहिं – Jhulan Lila

आजु रस, बरसत कुंजन माहिं |
मंजु – निकुंजनि – मंजुलता लखि, विधि विधिताहुँ लजाहिं |
झूला डर् यो कदंब डार पै, पै झूलत दोउ नाहिं |
पिय कह प्यारी ते ‘तुम झूलहु, हौं तोहिं काहिं झुलाहिं’ |
प्यारी कह पिय ते ‘तुम झूलहु, हौं झुलवहुँ तोहि काहिं’ |
नहिं कोउ झूलत नाहिं झुलावत, बहु विधि सखि समुझाहिं |
तब ‘कृपालु’ कह तुम दोउ झूलहु, हम दोउ झुलवत आहिं ||

भावार्थ – आज कुंज में विलक्षण रस बरस रहा है | सुन्दर निकुंज की सुन्दरता देखकर ब्रह्मा की कारीगरी भी लज्जित होती है | यद्यपि कदम्ब की डाल में झूला पड़ा है किन्तु प्रिया प्रियतम दोनों ही नहीं झूलते | श्यामसुन्दर कहते हैं कि हे सुकुमारी ! तुम झूलो और मैं झुलाऊँ | किशोरी जी कहती हैं कि हे सुकुमार ! तुम झूलो और मैं झुलाऊँ | इस प्रकार न कोई झूलता है और न कोई झुलाता है | सब सखियाँ समझा – समझाकर थक गयीं | तब ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि तुम दोनों में न कोई एक झूले और न कोई एक झुलावे वरन् तुम दोनों साथ बैठकर झूलो और मैं झुलाऊँ |

( प्रेम रस मदिरा निकुंज – माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित – राधा गोविन्द समिति

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