Sri Daan Lila

ब्रज भूमि की लीला – अलौकिक होत है
जिस को मिठो रस – लाल आज लूट रह्यो
ब्रज गोपियाँ चली – दूध दही बेचने को
कोई बेचे नवनीत – जो लाल को प्रिय
गुजर रही – गिरिराज की टढ़ेती से
हाशय परिहाशय – अन्नेक ऊँचे स्वर से
कंगन और नुपुर की – मधुर धवनि अती
ब्रज की राज – ऊँचे ऊँचे उड़ाई रही चाल से
बब्रजबाला रूप और , गुण अदभुत
है सब परम – प्रेम की उदार मुर्तियां
जो परम पावन – करे ब्रज भूमि को
लाल सखा संग – गौ बछड़े चराने आवत
नन्द बाबा को – गौ धन को है रखवालो
अन्नेक खेल खेले – ईश तत्तव की भूली
दाऊ दादा भी – मस्त है खेल में साथ
अरुण अति – तप रह्यो माथे को
भूख लगी बड़ी भारी – हुआ समय भोजन
लाल चोनक्यों – सुनी हाँसी गोपिन की
और मारग रोकी – दान माँग रह्यो
न चली एक – ब्रज नारियां के आगे
कह रही अबला हम – सबला है
न घभराती है – इन लफंगों से
जो करे उत्पात – ब्रज की भूमि में
चोरी को दूध दही – खाने की अद्दत बुरी
और लाल ने – राधे को रोकी मारग
तिरछी नज़र – गून्घट निकली देखे
ब्रज की गालियाँ – और प्रेम की नजरिया
मोहन यही अदा से – हुआ मोहित
तन , मन की -भूख मिटी -जो युगो की लगी
गीरीराज की सथली – बनी दान घाटी
जहाँ भकत -आज करे दान मोहन को
विजय्क्र्सना – ब्रज कृपा बिन पतित
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